ऐसा भी होता है

ऐसा भी होता है


ऐसा भी होता है

 

रमजान भाई ने कमरे में कदम रखा ही था कि प्रभा ठिठक-सी गई और अपनी जगह से उठकर रसोईघर के अन्दर चली गई। प्रभा के इस तरह से अचानक उठकर चले जाने से उसकी माँ लक्ष्मी श्वरी आश्चर्य में पड़ गई। उसने सोचा, 'अभी तो मेरे साथ बातें कर रही थी, यह एकदम क्या हो गया इसे ? रमजान को देखकर प्रभा रसोईघर में क्यों घुस गई? आज बहुत दिनों के बाद लक्ष्मीश्वरी को प्रभा के साथ बातें करने का मौका मिला था और मौका ताड़कर ही उसने बातों-ही-बातों में प्रभा से एक सवाल भी किया था। ऐसा सवाल जिसे वह कई दिनों से अपने दिल में सहेजे हुए थी और आज उसका जवाब प्रभा के मुँह से सुनने को आतुर थी। उसे मालूम था कि प्रभा का क्या उत्तर होगा! दरअसल, उसने ताड़ लिया था कि मास्टरजी प्रभा में विशेष रुचि लेने लगे हैं और दोनों एक दूसरे को चाहते हैं। किन्तु यह सब जानते हुए भी वह प्रभा की इस सम्बन्ध में राय जानना चाहती थी। यों तो लड़का अच्छा था। जैसा मध्यवर्गीय परिवार का होता है, वैसा ही। लड़का उसे पसन्द आ गया था। उसने सोचा था- 'प्रभा के लिए इससे बढ़कर अच्छा लड़का कहाँ मिलेगा?' लेकिन इसी के साथ उसके दिल में यह संदेह भी था कि यदि प्रभा मास्टर जी के साथ शादी करना स्वीकार कर भी ले तो क्या प्रभा के पिताजी इस रिश्ते के लिए सहमत हो जाएँगे? संदेह की यह दीवार उस समय और मजबूत हो जाती जब वह उन लाड़ली लड़कियों के बारे में सोचती जो खाते-पीते घरानों में बहुएँ बनकर तो गई, सुशील और कमाऊ पतियों की पत्नियाँ तो बनीं, लेकिन अच्छा दहेज न मिलने के कारण सास और ससुर के तानों का जीवन भर शिकार बनीं। वह यह भी जानती थी कि अच्छा दहेज देने की उनकी हैसियत तो है नहीं। अपने आप लड़का मिल रहा है फिर क्यों नहीं मानेगा प्रभा का पिता ? लड़का अच्छे परिवार का है, नौकरी करता है, सुशिक्षित है, भला कौन-सी कमी है उसमें? मेरे विचार से तो यह जोड़ी ठीक रहेगी। लक्ष्मीश्वरी आज प्रभा का मन टटोलना चाहती थी, पर तभी रमजान भाई ने कमरे में प्रवेश किया था। रमजान भाई ने खाँसते हुए लक्ष्मीश्वरी को सलाम किया। रमजान लक्ष्मीश्वरी के उदासीन व्यवहार से तनिक अप्रसन्न हुआ। वह भी वक्त था जब वह रमजान भाई को रास्ते में ही प्रभा की कुंडली पकड़ाकर किसी अच्छे परिवार में बात चलाने की विनती करती और आज उसको रमजान भाई के सलाम का जवाब देना भी गवारा नहीं हुआ। कुछ क्षणों के बाद लक्ष्मीश्वरी अपने आप से कहने लगी 'अच्छा, अब समझी ! रमजान भाई की देखकर प्रभा यहाँ से क्यों खिसक गई?' उसको रमजान भाई की मध्यस्थता की आवश्यकता नजर नहीं आई। उसने रमजान भाई की ओर देखकर कहा- 'कहो, कैसे याद किया आज?” रमजान भाई ने कन्धों पर से चादर ढीली की और जूतों को उतारे बिना सामने बिछी चटाई पर बैठ गया। लक्ष्मीश्वरी की बात का उसने कोई जवाब नहीं दिया। लक्ष्मीश्वरी उठ खड़ी हुई और कंधों को उचकाती हुई बोली- 'देख ली तेरी मिलनसारिता ! इतने बड़े शहर में मेरी चाँद-सी बेटी के लिए लड़का नहीं मिला तुझे अब तक!' रमजान भाई सब कुछ सुनता रहा। फिर दम संभालकर बोला 'बहन, तुमको कोई लड़का पसन्द नहीं आए तो इसमें मेरा क्या दोष?' लक्ष्मीश्वरी की साड़ी का पल्लू उसके सिर से नीचे खिसक गया था। उसे ऊपर सरकाते हुए वह बोली- 'हाँ, तुम तो, भाई, यही कहोगे। अब तक सिर्फ दो लड़के बताए तुमने । मगर वे दोनों भी कौन-से खरे थे, एकदम बेकार!' इस बीच लक्ष्मीश्वरी ने टोकरी में से दो कुंडलियाँ निकाली और इन्हें रमजान भाई को बेमन से संभलाया। दरअसल, लक्ष्मीश्वरी के दिल में अब दूसरी ही आस बँध गई थी। अब वह जानती थी कि बिटिया के लिए लड़का ढूंढ़ने की उलझन से वह मुक्त हो गई है। भगवान ने उसकी बिटिया के लिए उसके ही घर में एक योग्य और पढ़ा-लिखा वर भेज दिया है। उसका मनोरथ अब लगभग पूरा हो गया था। यों रमजान भाई अपने काम में कम होशियार न था। शहर के अधिकाँश पंडित घरानों में उसका आना-जाना था। शादी लायक लड़के-लड़कियों की हर बात की उसको जानकारी रहती थी। यहाँ तक कि विवाह योग्य चार-पाँच लड़के-लड़कियों के नाम-पते उसकी जुबान पर हरदम रहते । लक्ष्मीश्वरी की बातों से उसने अन्दाज लगाया कि जो दो लड़के मैंने बताए थे वे इसे पसन्द नहीं आए हैं। अब उन दो रिश्तों के बारे में कुछ और कहना बेकार था। गत वर्ष एक अन्य रिश्ता भी उसने सुझाया था और मामला बैठ भी जाता, मगर लेन-देन की थोड़ी-सी बात को लेकर बात टूट गई थी। लक्ष्मीश्वरी के पति पंडित लक्ष्मणजी अमीरा कदल में एक व्यापारी के यहाँ मुनीम थे। वरपक्ष वाले इस भ्रम में रहे कि लक्ष्मणजी ही मालिक हैं और यह अपेक्षा करते रहे कि दहेज में अच्छी-खासी रकम हाथ लगेगी। लक्ष्मणजी का चोर-बाजारी करके लखपति जरूर बन गया मगर लक्ष्मणजी वैसा का वैसा ही रहा। यह थी कि वह अपने लिए दूसरा कुर्ता पाय खरीदने के लिए भी पैसे नहीं जुटा पाता रमजान भाई को इन सभी बातों का ध्यान था लम्बी साँस खींचकर वह बोला-'अच्छा, मैंन दूसरे लड़के का जिक्र किया था ना, उस ओवर लड़के का। उसके बारे में क्या राय है?' लक्ष्मीश्वरी अब रसोईघर के पास आकर गई थी। बोली 'ना, ना ये ओवरसियर और इंजीबड़े लालची होते हैं। कोई और लड़का नजर ने तो बात करो।' देखा जाए तो यह बात उसने यों ही रमजा भाई से कही थी। असलियत तो यह थी कि के लिए लड़का उसने देख लिया था। कुआं के पास ही आ गया था। यह कुआं आज लक्ष्मीश्वरी के घर में उसके बच्चों की पढ़ाई प्यास बुझाता था। नाम था मोहनलाल । लक्ष्मी को वह भा गया था। सबके सामने उसकी प्र करते वह थकती न थीः परिश्रमी लड़का है, नौक भी करता है और ट्यूशन भी पढ़ाता है। इन बढ़कर और क्या चाहिए लड़के में ! शक्ल सूरत अच्छी है। सबसे बड़ी बात यह है कि दहेज से सख्त चिढ़ है। काश, मेरी बिटिया को ऐसा ही योग्य वर मिलता ! रमजान भाई ने दोनों कुंडलियाँ जेब के हवाकर दीं और वहाँ से चल दिया। उसके आँगन बाहर निकलते ही लक्ष्मणजी ने प्रवेश किया। निकी तरह कोट उतारकर पलंग पर रख दियखिड़की से नजर दौड़ाई तो रमजान भाई को ग से निकलते देखा। वह किसी दूसरे घर में घुस था। प्रभा रसोईघर से बाहर निकली और पिता जूतों को दरवाजे के पीछे रखा। लक्ष्मणजी ने बेटी से कहाः 'बेटी ! पानी पिलानतो, प्यास लगी है।' प्रभा तुरन्त एक हाथ में हु ओर दूसरे में पीतल का खाली लोटा लेकर नीचे नल से ताजा पानी लेने गई। लक्ष्मीश्वरी 'कांगड़ी' में कोयलों को फूंकने लगी, फिर लक्ष्मणजी से पूछा-'खाना अभी लगा दूं या बाद में खाओगे? "बाद में खाऊँगा।" अरे हाँ, यह रमजान आया था क्या? क्या कह रहा था वह ?' लक्ष्मणजी ने पत्नी से पूछा। क्या कहता? दो कुंडलियाँ लाया था, मैंने लौटा दीं।' लक्ष्मीश्वरी ने खिड़की के पास जाकर कहा। 'क्यों?' लक्ष्मणजी ने चकित होकर पूछा। लक्ष्मीश्वरी ने इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया। वह प्रभा को खिडकी से जोर से आवाज देने लगी 'अरी प्रभा, ओ प्रभा ! पिता के लिए पानी लेकर आ जल्दी, बातें बाद में कर लेना। प्रभा नल पर अपनी सहेलियों के साथ हँस हँस कर बतिया रही थी। शायद वे उससे रमजान भाई के बारे में कुछ पूछ रही थीं। लक्ष्मणजी पत्नी की आवाज सुनकर तनिक रुष्ट हुए धीरे से बोलती तो क्या हो जाता ? कितनी बार समझाया कि सयानी लड़की से ऐसे नहीं बोला जाता।' पति की बात सुनकर लक्ष्मीश्वरी अनमनी सी हो गई। उसने 'काँगड़ी' एक तरफ रख दी और साड़ी के पल्लू से बालों को ठीक तरह से ढक लिया। फिर वह एक ओर हट गई। पत्नी का यह रूखा व्यवहार देखकर लक्ष्मणजी दाँत पीसते रह गए। वे भी दीवार के सहारे बैठ गए और अपना दायाँ हाथ खिडकी की चौखट पर धरकर ध्यानमग्न हो गए। सामने खिड़की से शंकराचार्य का पर्वत अपनी पूरी शोभाश्री के साथ दिखाई दे रहा था। लक्ष्मणजी मन-ही-मन कुछ मंत्र जाप करने लगे। लक्ष्मीश्वरी का दम भीतर ही भीतर घुटने लगा। वह पति को एक महत्वपूर्ण बात बताने वाली थी आज । उसका दिमाग, वास्तव में, चढ़ा हुआ था। लक्ष्मणजी को लक्ष्मीश्वरी की चुप्पी बड़ी अखर रही थी। आखिर लक्ष्मणजी ने ही चुप्पी तोड़ी- 'आज कौन-सा खजाना मिल गया है तुझे जो ऐसे अकड़ रही हो?' 'हाँ-क्यों न मिला हो ?' लक्ष्मीश्वरी ने झट उत्तर दिया। हल्का हल्का क्रोध उसे भी आ रहा था। 'कौन-सा खजाना ? मैं भी तो सुनूं। बेटी के लिए लड़का ढूँढ़ते ढूंढ़ते कमर टेढ़ी हो गई है। उंह, खजाना मिला है!' लक्ष्मणजी ने ऐसे मुँह बनाकर कहा मानो आज उसने पत्नी के साथ झगड़ा करने की जिद्द पकड़ ली हो। 'अच्छा, यदि सच कह दूं तो मानोगे? 'कहो भी तो क्या बात है?' 'बुरा तो नहीं मानोगे?' लक्ष्मीश्वरी ने दबे स्वर में पूछा। 'अच्छा बाबा नहीं मानूंगा, अब बोल भी जाओ। लक्ष्मणजी ने आश्वासन दिया । 'सुनो, मैंने प्रभा के लिए लड़का देख लिया है।' लक्ष्मीश्वरी ने ऐसे कहा मानो किसी रहस्य का वह उद्घाटन करने वाली हो । लक्ष्मणजी के चेहरे पर एक अजीब-सी रंगत छाने लगी। उसी समय प्रभा ने कमरे में प्रवेश किया। उसने हुक्का और नै पिता के सामने रख दिए। पानी से भरा लोटा माँ को दे दिया। फिर चिमटी से चिलम को अंदर से खरोचने लगी। लक्ष्मणजी एक ही साँस में लोटे का सारा पानी पी गए। 'छोड़ो बिटिया, मैं खुद ही चिलम भरूंगा' चिलम लेकर उन्होंने खाली लोटा लक्ष्मीश्वरी को थमाया। लक्ष्मीश्वरी पति का भाव ताड़ गई। वह प्रभा से कहने लगी 'जा बेटी ! जरा देख तो बच्चे क्या कर रहे हैं? भगवान जाने आज मास्टरजी को इतनी देर क्यों हो गई?' 'वे तो नीचे कमरे में मोनू भैया और नीपू को पढ़ा रहे हैं। मैं देखकर आई हूँ।' कहकर प्रभा वहाँ से चली गई। 'अच्छा, तो लगता है कोई कुण्डली मिल गई है?' लक्ष्मणजी ने चिलम पर कोयला रखते हुए बात चलाई । 'कुण्डली-वुण्डली की बात छोड़ दो, बिटिया के लिए एक योग्य वर हमें अपने आप मिल गया है।' लक्ष्मीश्वरी बोली। 'पर कैसे? कौन-सा वर? साफ-साफ क्यों नहीं कहती हो?' लक्ष्मणजी हुक्के से धुआँ उगलने लगे। लक्ष्मीश्वरी पति से रहस्य का उद्घाटन करना चाहती थी, मगर साहस नहीं बन पड़ता था। यदि उनको यह रिश्ता पसन्द न आए, तो? लड़के का नाम सुनकर वे भला क्या सोचेंगे? कहीं वे सहमत न हुए, तो? कहीं वे यह न सोच बैठें कि माँ-बेटी ने मिलकर मास्टरजी के साथ कोई समझौता किया है, आदि-आदि । उसके दिमाग में ऐसे ही कई विचार आने-जाने लगे। कुछ ही क्षण बाद वह इन सब बातों से हटकर दूसरी ओर चली गई-आज न सही, कल इनको जरूर कहना ही पड़ेगा। फिर उस वक्त क्या जवाब दूंगी? काफी सोच-विचार के बाद वह पति से बोली- 'आजकल हर मुहल्ले में किसी न किसी के घर शादी हो रही है। 'क्यों न हो। भाग्यवानों के लिए यह कौन-सी बड़ी बात है। हमने भी बिटिया के हाथ गत वर्ष पीले कर दिए होते, लेकिन क्या करें। प्रभु को मंजूर न था। खैर, जो ऊपर वाले की इच्छा होगी, वही होगा। म मगर तुम तो अभी कहती थी कि बिटिया के लिए कोई लड़का तुमने देख लिया है।' यह सुनकर लक्ष्मीश्वरी पहले तो चुप रही, फिर साहस बटोरकर असली बात कहने पर विवश हो गई 'आपसे अब क्या छिपाना', कहकर वह पति के एकदम निकट आ गई। 'पर है कौन वह लड़का?' लक्ष्मणजी ने नै पर ठोड़ी टिकाकर कहा। 'अपने मास्टर मोहनजी !' कहकर लक्ष्मीश्वरी पति के चेहरे का भाव पढ़ने लगी। 'क्या कहा मोहनजी ? तुम पागल तो नहीं हुई हो?' लक्ष्मणजी ने कहा। लक्ष्मणजी तनिक आवेग में आकर फिर बोले- 'तुम्हारा सिर! क्या बकवास कर रही हो ? मास्टरजी से प्रभा का रिश्ता करेंगे हम ?' 78 लक्ष्मीश्वरी का दिल धक् धक् करने तनिक दम संभालकर वह पति से फिर ब बकवास नहीं कर रही, सच कह रही हूँ खयाल से वह एक अच्छा लड़का है और अच्छा लड़का हमें और कहाँ मिलेगा? मैंन लगा लिया है। घर में उसके माँ और एक ब बहन की भी शादी हो गई है। 'यह सब तुमको किसने कहा, प्रभा ने 'वह क्या उसके साथ ऐसी बातें करती 'फिर यह सब किसने कहा तुमको?' लक्ष्मीश्वरी के पास इस प्रश्न का कोई उ था। वह बात को टालकर बोली- 'अब जिसनेकहा हो, तुम्हें उससे क्या? मेरे खयाल में बुरा नहीं है। हमें तुरन्त कुछ करना चाहिए। पत्नी की बात सुनकर लक्ष्मणजी गहन स डूब गए सचमुच अब इस लड़के से बढ़कर शहर में और कौन-सा लड़का हमें मिलने है। बहुत कोशिश की मगर ठीक-ठाक ल मिल नहीं रहा है। दो महीने से हमने उसको भी नहीं दिया है। कल महीने की पहली ता है। कल ही उसको दो माह को वेतन मिनचाहिए। 'एक बात कहूँ।' लक्ष्मीश्वरी ने पति को ढा बंधाते हुए कहाः 'नाथजी की कसम, मैं सचारही हूँ, कहकर लक्ष्मीश्वरी मोहन जी की प्रश करने लगी। 'कल मोहनजी ने बच्चों से पूछा कि प्रभाजी कहाँ है?' 'हाँ तो फिर? 'फिर, फिर क्या होता है? यह भी कोई पूरकी बात है भला ? ज्यों ही प्रभा ने यह बात सु वह पानी-पानी हो गई। मैं उसी वक्त समझ कि दाल में कुछ काला जरूर है। 'आखिर बात क्या है? तुम लोग मुझे सबक खुलकर क्यों नहीं बताते ?' 'आपको सबकुछ खुलकर तब कहें नाज आप कुछ सुनने को तैयार हों।' 'देखो, ऐसे ताने मत दो । तुमने कब क्या कहा और मैंने कब क्या नहीं सुना ? बता सकती हो तुम?' 'यह कैसी बातें करते हैं आप? यह समय तू-तू मैं मैं का नहीं है। हमें कुछ करना चाहिए। देखो, मुझे लगता है कि मास्टरजी प्रभा से शादी करने को तैयार हैं लेकिन वे हमसे ऐसी बात करने का साहस नहीं कर पा रहे हैं। अभी उसका दो मास का वेतन हमारे पास है फिर भी उसने पैसे नहीं मांगे। कितना शरीफ लड़का है!' लक्ष्मणजी ने चुप्पी भर ली जिससे लक्ष्मीश्वरी ताड़ गई कि उसके पति को भी यह रिश्ता मंजूर है। वह मास्टरजी के बारे में और भी बढ़ा-चढ़ाकर कहने लगी 'मैंने उसके साथ बहुत बार बातें की। मुझे लगता है कि उसे प्रभा पसन्द है और वह शादी के बारे में अपने मन की बात कहना चाहता 'ठीक है, अगर तुम्हें लड़का पसन्द है तो मुझे कोई हर्ज नहीं है। मेरी ओर से कोई रुकावट नहीं है। जो कुछ भी हमारी ताकत होगी, हम दहेज में दे देंगे।' लक्ष्मणजी ने गंभीर होकर कहा। यह सुनकर लक्ष्मीश्वरी मचल उठी। कहा- 'कितना अच्छा रहता यदि आप स्वयं इस बारे में लड़के के माँ-बाप से या फिर खुद मास्टरजी से बात करते।' 'पर अभी कौन-सी जल्दी है?' 'आज ही यदि बात चलाते तो कितना अच्छा रहता। आप ही तो कहते हैं कि शुभ काम में कभी देरी नहीं करनी चाहिए। आज मुहूर्त भी बढ़िया है।' ब्याह!' 'तो तुम्हारा मतलब है कि चट मंगनी और पट 'नहीं, यह बात नहीं है। पर लड़के से बात करने में हर्ज भी क्या है?' जब लक्ष्मीश्वरी ज़िद करने लगी तो लक्ष्मणजी को कहना पड़ा 'जैसी तुम्हारी इच्छा ।' कॉशुर समाचार दिसम्बर 2025 अभी लक्ष्मणजी ने बात पूरी नहीं की थी कि प्रभा दौड़ती हुई ऊपर आ गई लजाते- । सकुचाते हुए रसोईघर के दरवाजे की ओट में खड़ी हो गई। उसके पीछे-पीछे मास्टरजी भी आ रहे थे। अब तक लक्ष्मणजी को पत्नी की बातों पर कुछ संदेह था, पर अब वह दूर हो गया। सोचा, 'अच्छा, तो बात यहाँ तक पहुँच गई है। लक्ष्मणजी ने अब मोहनलाल को दामाद समझकर आदर से नमस्ते की और झट से उठ खड़े हुए 'आइए, आइए, यहाँ बैठ जाइए।' मोहनलाल दरवाजे पर ही खड़ा रहा- 'थोड़ा जल्दी में हूँ। घर वाले मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे।' मैं मैं बहुत दिनों से आपको एक बात कहना चाहता था, कहकर मास्टरजी ने, रसोईघर की ओर देखा। दोनों पति-पत्नी मास्टरजी के सामने याचक बनकर खड़े हो गए। प्रभा रसोईघर में सबकुछ सुन रही थी। उसके तन-मन में एक रोमांच-सा हो रहा था। मोहनलाल के होंठ कुछ हिलने लगे। पूरी बात वह कह नहीं पा रहा था-'मेरी एक विनती है।' दोनों की नज़रें मोहनलाल के होंठों पर स्थिर हुईं। दोनों का दिल धकधक कर रहा था। मास्टरजी बालों पर हाथ फेरकर कहने लगे-'परसों प्रभाजी व बच्चों को मेरे घर भेजना । यह सुनकर पति-पत्नी आश्चर्य करने लगे। मास्टरजी ने सिर झुका लिया। उसको पता था कि अब ये इसका कारण पूछेंगे। जब इन्होंने कुछ नहीं पूछा तो मास्टरजी एक ही साँस में बोले- 'मेरा लग्न इसी रविवार को है ना।' 'क्या कहा?' दोनों पति-पत्नी एक साथ बोल पड़े। 'हाँ, मैं सच कह रहा हूँ। मास्टरजी ने छोटा-सा उत्तर दिया। लक्ष्मणजी और लक्ष्मीश्वरी मास्टरजी का यह उत्तर सुनकर तड़प उठे। लक्ष्मीश्वरी को जैसे ज़ोरदार दौरा पड़ गया, वह एकदम नीचे बैठ गई।

 

 

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साभार:-  डॉ. शिवन कृष्ण रैणा   कॉशुर समाचार दिसंबर 2025-12-01